पलायन करने वाले श्रमिक परिवारों में बच्चों की षैक्षिक समस्या पर एक अध्ययन

 

डाॅ.देवेन्द्र कुमार1, डाॅ.अब्दुल सत्तार2, श्रीमती भारती कुलदीप3

1सहायक प्राध्यापक, कंिलंगा विष्वविद्यालय, नया रायपुर

2विभागाध्यक्ष, कमला नेहरू महाविद्यालय, कोरबा

3श्रीमती भारती कुलदीप, सहायक प्राध्यपक, कमला नेहरू महाविद्यालय, कोरबा

*Corresponding Author E-mail:

 

ABSTRACT:

षिक्षा जन्म से मृत्युपर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है षिक्षा के माध्यम से बालक या व्यक्ति स्वयं को ज्ञान और अनुभव का धनी बनाता है। ज्ञान, अनुभव और समायोजन द्वारा वह अपने व्यवहार को परिवर्तित कर समय उपयोगी, षुद्ध और कल्याणकारी बनाता है। अतः हम कह सकते हैं,कि षिक्षा मानव चेतना का ज्योर्तिमय सांस्कृतिक पक्ष है, जिससे व्यक्तित्व का बहुमुखी विकास होता है। अरस्तु ने ठीक ही कहा है कि - मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।’’ षिक्षा के अभाव में मानव जीवन की कल्पना करना असंभव है। सृष्टि से लेकर अब तक षिक्षा का प्रभाव अस्तित्व भली प्रकार स्वीकार किया जा रहा है। जब तक संसार में मानव का अस्तित्व बना रहेगा, तब तक षिक्षा की प्रक्रिया निरंतर चलती रहेगी।

 

KEYWORDS:  षिक्षा, षैक्षिक समस्या, श्रमिक परिवार, पलायन

 


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प्राचीन काल से ही ‘‘षिक्षा’’ षब्द का प्रयोग किसी किसी अर्थ में होता चला आया है। षिक्षा माता के समान पालन-पोषण करती है, पिता के समान उचित मार्गदर्षन द्वारा अपने कार्यो में लगाती है तथा पत्नी की भांति संसारिक चिंताओं को दूर कर प्रसन्नता प्रदान करती है। षिक्षा के द्वारा हमारी कीर्ति का प्रकाष चारो ओर फैलता है। षिक्षा हमारे जीवन को सुसंस्कृत बनाती है।

 

जिस प्रकार सूर्य का प्रकाष के अस्त होने पर कमल के फूल कुम्हला जाता है,ठीक उसी प्रकार षिक्षा के प्रकाष को पाकर प्रत्येक व्यक्ति कमल के फूल की तरह खिल उठता है तथा अषिक्षित रहने पर दरिद्रता एवं कष्ट के अंधकार में डूबा रहता है।

 

षिक्षा मनुष्य की आंतरिक क्षमताओं का बाह्यरूप में प्रकटीकरण का एक माध्यम है। प्रत्येक व्यक्ति के अंदर वे सभी जैविकीय विषेषताएं विद्यमान होती है जो उसे एक सम्पूर्ण व्यक्तित्व बनाने में सहायक सिद्ध हो सकती है,लेकिन व्यक्ति के समाजीककरण की प्रक्रिया उसके इस मार्ग की चुनौती होती है,क्योंकि व्यक्ति का सामाजिक-आर्थिक वातावरण ही उसके सामाजीकरण का आधार होता है। यही वजह है,कि निम्न सामाजिक-आर्थिक स्थिति वाले परिवारों में ज्यादातर षिक्षा के प्रति जागरूकता कम देखी जाती है। परिणामतः स्वयं तथा बच्चों के षिक्षा के विषय में उसे सोचने का वक्त नहीं होता है।

 

भारत एक कृषि प्रधान देष है। जिसमें अधिकांष लोग ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करते है। इनका प्रमुख कार्य कृषि करना है। भारत के अधिकांष जनता कृषक, मजदूर, रिक्षेवाले, ठेले वाले, टांगेवाले,खेतिहर मजदूर,श्रम पलायन करने वाले और अन्य कार्य करने वाले होते है। इन लोगों में षिक्षा के प्रति जागरूकता की कमी रहती है। अपने बच्चों को सही ढ़ंग से षिक्षा के प्रति ध्यान नही दे पाते है। यहां तक की अपने बच्चों को प्राथमिक षिक्षा भी ग्रहण कराने में समर्थ रहते है। इस कारण सरकार द्वारा अनेक योजनाएं चलाए जा रही हैं जैसे - निःषुल्क एवं अनिवार्य षिक्षा, पढ¬़बो-पढ़ाबों योजना, मध्यान्ह भोजन कार्यक्रम, सर्वषिक्षा अभियान है। जिसका उद्धेष्य गरीब बच्चों को अधिक से अधिक लाभ मिल सके और षिक्षा के प्रति रूचि जागृति हो सके।

 

आजादी के 65 वर्ष बीत जाने के बाद हमारी भावना सुखमय जीवन व्यतीत करने की रही है, लेकिन जनसंख्या वृद्वि के कारण बेरोजगारी, खाद्यान्न में कमी, भूखमरी, आवास, भोजन, स्वास्थ्य, पर्यावरण की समस्या बढ़ती जा रही है। जिसके कारण मनुष्य का जीवन सुखमय से कष्टमय हो गया है। आजादी के बाद हमारी सरकार ने पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से देष के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विकास के साथ-साथ बड़े-बड़े उद्योग स्थापित किए है। कृषि को उन्नत एवं विकसित किया गया, यातायात के साधनों में वृद्वि की गई, समाज सुधार तथा सांस्कृतिक विकास के नये-नये कार्यक्रम आरंभ किए गए। फिर भी आज हमारा देष विकास में पिछड़ा हुआ है।

 

पलायन एक बहू आयामी घटना है,जिसका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव आर्थिक विकास जनषक्ति नियोजन,नगरीकरण और सामाजिक परिवर्तन पर पड़ता हैं। वर्तमान के निरंतर परिवर्तित होते सामाजिक-आर्थिक परिवेस के संदर्भ में भारत की ग्रामीण जनसंख्या का गांवो  से नगरों एवं महानगरों की आरे पलायन की प्रवृत्ति में अप्रयक्षित वृद्धि हुई है। जिसने केवल जनसंख्या नियोजकों एवं निति निर्घारकों के समक्ष चुनौती प्रस्तुत की है,अपितु क्षेत्रीय, सामाजिक,आर्थिक विकास पर भी प्रष्न चिन्ह लगा दिया हैं। ग्रामीण क्षेत्रों से जनसंख्या के अधिकाधिक पलायन से केवल ग्रामीण क्षेत्रों की अर्थ व्यवस्था प्रमाणित होती है,अपितु तत्कालिक परिपेक्ष्य में पलायनकर्ताओं के गंतव्य स्थल की अर्थव्यवस्था भी प्रमाणित होती हैं।

 

छत्तीसगढ़ में बेरोजगारी के कई कारण उपलब्ध है जिसका कारण बेरोजगारी में वृद्धि होती जा रही है इस बेरोजगारी के कारणो ही श्रमिक पलायन के लिए मजबूर होते है प्रष्न यह है कि समस्या किसे माने बेरोजगारी को या पलायन को यदि बेरोजगारी समस्या है ,तो उसका परिणाम पलायन है तथा हमें बेरोजगारी का समाधान ढुढ़ना चाहिए यदि पलायन एक समस्या है तो हमें इसे रोकने के उपाय निर्मित करने होंगे तथा यदि इसे मात्र एक राजनीतिक समस्या बनाए रखना है तब इस भयावह बेरोजगारी को कम करने का एक मात्र समाधान पलायन ही हैं। क्योंकि पलायन करने वाले लोग पलायन स्थल पर रोजगार भी तलाष नहीं करते तथा इस प्रकार वहाॅ बेरोजगारांे की समस्या कम होती जा है।

 

बच्चों के विकास में सबसे महत्वपूर्ण योगदान षिक्षा का है, षिक्षा प्रकाष का वह स्रोत है, जो बालक के विकास के प्रत्येक पक्ष में सच्चा पथ प्रदर्षन करती है और यदि बालक के परिवार आर्थिक समस्या से ग्रसित है तो उनके लिये षिक्षा कैसे विकास का कारण बन सकता है। इस तरह आज षोषित,दलित मजदूर वर्ग के लोगो के बच्चे के समक्ष अनेक समस्याएं होने के कारण वे षिक्षा से वंचित रह जाते है।

 

अतः स्पष्ट है,कि छत्तीसगढ़वासियों का सम्पूर्ण जीवन आधार कृषि है। कृषि का स्वरूप भी अनुपजाऊॅ एवं एक फसलीय है। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों की बढ़ती जनसंख्या एवं आवष्यकताओं की वृद्धि ने ग्रामीण क्ष्ेात्रों से श्रम पलायन की प्रवृत्ति में निरंतर वृद्धि की है। जिसके परिणामस्वरूप स्थानीय श्रम की अनुपलब्धता ने स्थानीय विकास को प्रभावित किया है। इसी बात को दृष्टिगत रखते हुए इस विषय पर शोध कार्य प्रस्तुत किया गया है,ताकि छत्तीसगढ़ से श्रम पलायन का बच्चों की षिक्षा पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन किया जा सकें। प्रस्तुत षोध प्रबंध -‘‘श्रम पलायन करने वाले श्रमिक परिवारों में बच्चों की षैक्षिक समस्या पर एक अध्ययन’’षोधकर्ता द्वारा इस समस्या के समाधान के लिए अध्ययन किया गया है। जिसके द्वारा पलायन करने वाले श्रमिक परिवारों में बच्चों की षैक्षिक समस्या पर अध्ययन की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हुई है।

 

पलायन का अर्थ:-

सामान्यतः किसी एक भौगोलिक क्षेत्र से दुसरे भौगोलिक क्षेत्र में सापेक्षित स्थायी गमन की प्रक्रिया प्रव्रजन के नाम से जानी जाती है। अन्य शब्दो में मनुष्य के निवास स्थान में परिवर्तन की घटना को ही पलायन कहा जाता हैं। यह घटना है। जिसमें एक मनुष्य या स्वतः प्राणी अपने मूल निवास अपनी जन्मस्थल को छोड़कर एक एैसे स्थान की ओर गमन करता है। जो उसके लिए बिल्कुल नया होता है और वह व्यक्ति उस जगह के लिए अपरिचित होता है पलायन सर्वकालीक एवं सार्वभौमिक प्रक्रिया है,जो सदियों से चली रही हेै एवं आने वाले सदियों में चलती रहेगी तथा विष्व के समस्त राष्टों एवं राज्यों में यह पाई जाती है तथा सदा पाई जायेगी।

 

छत्तीसगढ़ में पलायन के कारण:-

¼1½ राज्य की 30 जनसंख्या कृषि एवं संबंधित क्रियाओं में संलग्न है ,उनमें से 55 जनसंख्या कृषकों का तथा 26: जनसंख्या कृषि मजदूरों की है। प्रवजन का संबंध जनसंख्या के इसी बड़े भाग से है।

¼2½ स्थानीय कृषकों का तेजी से सीमांत कृषक और भूमिहीन मजदूर बनते जाना ं।

¼3½ राज्य के कुल कृषि भूमि का केवल 21.7: भाग ही सिंचित है। परिणाम स्वरूप कृषि कार्य हेतु वर्षा पर निर्भरता,उन्हें वर्ष के 6 माह बेरोजगार बनायें रखती है

¼4½  राज्य की कुल जनसंख्या का 45: भाग गरीबो रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहा है

¼5½ वनों की अंधा - धुंध कटाई से अनियमित वर्षा का होना तथा जनजातियों क्षेत्रों में वनीकरण के काम पर  स्थानीय लोगों को काम पर लगाया जाना

¼6½ राज्य में रोजगारमूलक योजनाओं के प्राप्ति उदासीनता का भाव होना

¼7½ राज्य के अधिकांष लोगों में पलायन करने की प्रवृति पाया जाना

 

अध्ययन की आवष्यकता:-

स्वस्थ्य शरीर में स्वस्थ्य मस्तिष्क का निर्माण होता है। षिक्षा स्वस्थ्य समाज का निर्माण करती है एवं स्वस्थ्य समाज में खुषहाली सम्पन्नता होती है। समाज की ईकाई व्यक्ति है। यह सर्वविदित है कि इस ईकाई की दृढ़ता पर समाज निर्भर रहता है। समाज सही दिषा में विकास करें। इसके लिए आवष्यक है कि समाज में रहने वाले षिक्षित हो। सभी लोगों को षिक्षित करने के लिए सिर्फ सरकारी नीतियाँ ही सहायक नहीं होती है वरन् व्यवहार के रुप में सकारात्मक कदम उठाने से है। पलायन करने वाले श्रमिक परिवारों के समक्ष केवल आर्थिक समस्या है वरन् सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक स्थिति से संबधित समस्याएं भी आती है। इन समस्याओं का उचित समाधान नहीं हो पाता तो वे कुंठा के षिकार हो जाते है। इस स्थिति में बालक - बालिका के विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इस समय उनको सही मार्गदर्षन की आवष्यकता होती है। पर पालक उनको पूरा-पूरा समय नही दे पाते, जिसका कारण यह है कि वे अपने प्राथमिक आवष्यकता (रोटी, कपड़ा मकान) की पूर्ति में दिन रात लगे रहते है। तो वे अपने बच्चों के विकास पर कैसे ध्यान दे पायेगे।

 

पलायन करने वाले श्रमिक परिवारों जो समाज में षोषक मेहनती कमजोर है, तथा रात दिन मजदूरी करने में लगे रहते है, वहां के बच्चांे का षैक्षिक स्तर बहुत अच्छा नहीं होता है और ये पलायन करने वाले श्रमिक परिवारों के लोगं षिक्षा के महत्व को भली-भांति समझते है। लेकिन अपने आर्थिक समस्या के कारण बच्चों के षिक्षा - अर्जन में उत्पन्न समस्या को दूर नहीं कर पाते। पलायन करने वाले श्रमिक परिवारों के बच्चों की षैक्षिक समस्या एक ज्वलंत समस्या के रुप में विद्यमान हैं। षासन द्वारा षिक्षा से संबंधित चलाये जा रहे विभिन्न अभियानों के फलस्वरुप भी वांछित परिणामों की प्राप्ति नहीं हो पा रही है। अतः पलायन करने वाले श्रमिक परिवारों के बच्चों की षैक्षिक समस्या का अध्ययन आवष्यक है। जिसके द्वारा इन बच्चों की समस्या का सूक्ष्म अध्ययन कर उन कारणों का पता लगाया जा सकें, जो इन बच्चों की षिक्षा के प्राप्ति में अवरोध उत्पन्न करते हैं। जिससे इन अवरोधों को दूर कर बच्चों को षिक्षा मुख्य धारा से जोड़ा जा सके। अतः उक्त बातें अध्ययन की आवष्यकता को व्यक्त करता है।

पूर्व मे किये गए षोध कार्य:-

किसी भी अध्ययन के चयन करने पश्चात् यह आवष्यक हो जाता है कि समस्याओं से संबंधित तथ्यों पर पूर्व में जो संबंधित षोध किये गये है। उनके निष्कर्षों का प्रयोग अपने षोध के विषय में समस्या के समाधान के लिये किया जाये। इसके लिए यह आवष्यक हो जाता है,कि विभिन्न षिक्षा षास्त्रियों मनोविज्ञानिकों ने पूर्व में जो षोध कार्य किये है, उनका अध्ययन किये गये है।

 

भारत में किये गये षोध का अध्ययन:-

चक्रवती एस. (1986) - इन्होंने प्राथमिक विद्यालय के बच्चों की षैक्षणिक उपलब्धि पर पालकों के व्यवसाय तथा षैक्षिक स्तर द्वारा पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन किया इनके अध्ययन के प्रमुख उद्देष्य - बालकों की षैक्षिक उपलब्धि पर सामाजिक आर्थिक पृष्ठभूमि तथा पिता के व्यवसाय का प्रभाव किस तरह से पड़ता है, का अध्ययन करना है।

 

.अहमद (1961) डी.एन.बहारा (1969) एवं आर.सी. चंदना (1970)  ने - क्रमषः बिहार,राजस्थान एवं पंजाब प्रांतों में व्याप्त पलायन की समस्या एवं उनके प्रभावों का संबंधित राज्यों की परिस्थितियों के अनुसार विष्लेषण किया है

 

जे.सी. फे एवं रेन्स (1963) में - आगे चलकर विस्तारित किया यह माडल इस तथ्य पर आधारित है कि कृषि क्षेत्र की तुलना शहरी औघोगिक क्षेत्रों में रोजगार के बेहतर अवसर का होना पलायन का एक प्रमुख कारक है।

 

ली (1966) -ने प्रवास को आकर्षण एवं विकषर्ण कारकों के आधार पर स्पष्ट किया है। टोडारो (1967) ने अपने माडल में (प्रवास संबंधी )चार प्रमुख बातों का उल्लेख किया है। ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर पलायन प्रमुखतः आर्थिक विषमताओं के कारण होता है। पलायन इस अनुमान पर आधारित होता है, कि ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी क्षेत्रों में रोजगार के अवसर एवं मजदूरी अघिक होगी,परंतु यह आवष्यक नहीं है, कि यह वास्तविकता भी हो। शहरी क्षेत्रों में रोजगार की उपलब्धता शहरी क्षेत्रों के बेरोजगारी दर से संबंधित होता है।

 

एस.के.शर्मा (1989) -ने अविभाजित मध्यप्रदेष में पलायन की समस्या एवं इसकेे कारण तथा पलायनकर्ता श्रमिकों द्वारा अपनाए जाने वाले परिवहन के साधनों तथा श्रमिकों द्वारा पलायन पश्चात् किए जाने वाले कार्यो का विष्लेषणकिया हैं।

अमत्र्य सेन (1999) - ने भारत के विभिन्न राज्यों में आए अकाल,बंगलादेष तथा इथोपिया में पड़े अकाल के आधार पर इस तथ्य को स्पष्ट किया है कि अकाल से कृषकों के साथ-साथ उन पर आश्रित भूमिहीन श्रमिकों की स्थिति और भयावह हो जाती है तथा यह स्थिति इन्हें हजारों किलोमीटर दूर पलायन करने के लिए विवष करती हैं।

 

एस.एल.निराला (2001) - ने छत्तीसगढ़ श्रमिक पलायन के विषय में लिखा है कि गरीबी और निर्धनता छत्तीसगढ़ के श्रमिकों की आर्थिक ,सामाजिक एवं शारीरिक शोषण की अंतहीन दषा का भी उल्लेख किया हैं।

 

गुप्ता एवं षर्मा (1996) ने अपने पलायन संबंधी अध्ययन में यह स्पष्ट किया है कि मुख्यतः पुरूष ही प्रवास करते हंै तथा महिलाएं सामान्यतः पुरूषों का अनुसरण करते हुए प्रवास करती है।

 

षर्मा एवं गुप्ता (1997) ने छत्तीसगढ़ में श्रमिक प्रव्रजन से संबंधित अध्ययन में यह पाया कि अन्तर जिला एवं राज्य के बाहर होने वाले प्रवास के पीछे आर्थिक समस्याओं को तथा राज्य सरकार द्वारा पर्याप्त एवं गंभीर प्रयासों के अभाव को प्रव्रजन का एक प्रमुख उत्तरदायी तत्व माना है।

 

सुन्दरी एंव रूखमणी (1998)  का अध्ययन महिला प्रवासी श्रमिकों से संबधित रहा है, जिसमें प्रवास का प्रवासी महिलाओं के बच्चों पर पड़ने वाले प्रभाव की विस्तृृत चर्चा की गई है। अध्ययन से यह ज्ञात हुआ है कि प्रवास स्थल पर शैक्षणिक सुविधाओं के अभाव होने के स्थिति में बच्चें षिक्षा से वंचिंत हो जाते है। कुछ प्रवासी मजदूर अपने बच्चों को प्रवास स्थल के विद्यालयों में पढ़ाना चाहते हैं, तो स्थानीय विद्यालयों में उन्हें आसानी से प्रवेष नहीं मिल पाता है, चूकिं श्रमिक मूल रूप से अर्थोपार्जन के लिए प्रवास करते है, ऐसी स्थिति में वे बच्चों की षिक्षा को लेकर तो गंभीर हो पाते है ना ही उस स्तर का प्रयास करते हैं। परिणामतः प्रवासी परिवारों में निरक्षर बच्चों की तादात बढ़ती चली जाती है।

 

विदेषों में किए गए षोध अध्ययन:-

स्पुता चेरिल एल. पाँलसन एवं सेराँन (सन् 1995)- इनके द्वारा बालक बालिकाओं की उपलब्धि पर परिव. स्पुता चेरिल एल. पाँलसन एवं सेराँन (सन् 1995) के आकार तथा पालकों के व्यवहार के प्रभाव का अध्ययन किया गया। उन्होंने यह निष्कर्ष प्राप्त किया कि किषोरी की उपलिब्धयों पर परिवार के आकार का आर्थिक स्थिति का तथा पालकों के सहयोग का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।

 

प्रवास के सिघ्दांत पर सर्वप्रथम अध्ययन रेवेन्सटीन (1885-1888) - के द्वारा किया गया है जिसे उन्होंने प्रवास का नियम कहा है। इसी क्रम में पैटरसन (1955) वेन्क एवं हारडेस्टी (1959)  ट्रेवर (1961) ,सहोता (1968), जोब्स एट आल (1992)  वेन्क एवं हारडेस्टी  (1993) आदि ने अपने अध्ययन में गैर आर्थिक कारकों को ग्रामों से शहरों की ओर पलायन में एक प्रेरक कारक माना है

 

बेल्हम (1971) ,लक्समेह (1974),अरोरा में एवं कुमार (1980) एवं यादव (1981) - ने पलयन एवं आयु संबंधी अपने महत्वपूर्ण अध्ययनों में इन्होंने यह मत प्रस्तुत किया है,कि पलायनकर्ताओं की आयु 15-34 वर्ष के मध्य होती है।

 

सजास्टेड (1962) ने पलायन संबंधी अध्ययनों मंे मानव निवेष सिद्धांत के अंतर्गत मौद्रिक और गैर मौद्रिक दोनों ही कारकों को गांवों से शहरों की ओर पलायन हेतु जिम्मेदार माना है।

 

जे.सी. फे एवं रेन्स (1963) में - आगे चलकर विस्तारित किया यह माडल इस तथ्य पर आधारित है कि कृषि क्षेत्र की तुलना शहरी औघोगिक क्षेत्रों में रोजगार के बेहतर अवसर का होना पलायन का एक प्रमुख कारक है।

 

बुलसरा (1965) ने कलकत्ता में पलायनकर्ता श्रमिकों के अध्ययन में यह पाया कि 82 प्रतिषत पलायनकर्ता अकुषल श्रमिक थे।

 

ली (1966) -  ने प्रवास को आकर्षण एवं विकषर्ण कारकों के आधार पर स्पष्ट किया है। टोडारो (1967) ने अपने माडल में (प्रवास संबंधी )चार प्रमुख बातों का उल्लेख किया है। ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर पलायन प्रमुखतः आर्थिक विषमताओं के कारण होता है। पलायन इस अनुमान पर आधारित होता है, कि ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी क्षेत्रों में रोजगार के अवसर एवं मजदूरी अघिक होगी,परंतु यह आवष्यक नहीं है, कि यह वास्तविकता भी हो। शहरी क्षेत्रों में रोजगार की उपलब्धता शहरी क्षेत्रों के बेरोजगारी दर से संबंधित होता है।

टोडारो (1967) ने अपने माॅडल में (प्रवास संबंधी) चार प्रमुख बातों का उल्लेख किया है कि ग्रामीण क्षेत्रों से षहरों की ओर पलायन प्रमुखतः आर्थिक विषमताओं के कारण होता है।पलायन इस अनुमान पर आधारित होता है,कि ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में षहरी क्षेत्रों में रोजगार के अवसर एवं मजदूरी अधिक होगी, पंरतु यह आवष्यकता नहीं है,कि यह वास्तविकता भी हो। षहरी क्षेत्रों में रोजगार की उपलब्धता षहरी क्षेत्रों के बेरोजगारी दर से संबंधित होता है। षहरी क्षेत्रों मंे बेरोजगारी की उच्च दर ग्रामीण एवं षहरी क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों में व्याप्त बहुत बड़े अंतर का परिणाम है।

 

बेल्हम (1971) एवं लक्समेह (1974) ने पलायन एवं आयु संबंधी अपने महत्वपूर्ण अध्ययनों में इन्हांेने यह मत प्रस्तुत किया है कि पलायनकर्Ÿााओं की आयु 15-34 वर्ष के मध्य होती है।

 

अध्ययन का उद्देष्य:- प्रस्तुत अध्ययन हेतु निम्न लिखित उद्देष्यों का निर्माण किया है -

01.  पलायन करने वाले श्रमिक परिवारों की आथर््िाक एवं सामाजिक स्थिति का अध्ययन करना।

02.  पलायन करने वाले श्रमिक परिवारों की षैक्षिक स्थिति का अध्ययन करना।

03.  पलायन करने वाले श्रमिक परिवारों में बच्चों की षैक्षिक समस्या का अध्ययन करना।

 

अध्ययन की परिकल्पना:-  प्रस्तुत समस्या के अध्ययन हेतु शोधकत्र्ता ने निम्न लिखित परिकल्पनाएँ निर्मित की है -

01.  परिकल्पना एच 1- पलायन करने वाले श्रमिक परिवारों की आथर््िाक एवं सामाजिक स्थिति निम्न हो सकती है।

02.  परिकल्पना एच 2- पलायन करने वाले श्रमिक परिवारों की षैक्षिक स्थिति निम्न हो सकती है।

03.  परिकल्पना एच 3 - पलायन करने वाले श्रमिक परिवारों में बच्चों की षैक्षिक समस्या हो सकती है।

 

अध्ययन की परिसीमा:- प्रस्तुत शोध समस्या के अध्ययन के लिए षोधकर्ता ने निम्नलिखित परिसीमाओं का निर्माण किया है -

01.  प्रस्तुत अध्ययन हेतु जांजगीर-चांपा जिले का चयन किया गया है। प्रस्तुत अध्ययन हेतु जांजगीर-चांपा जिलेे के अंतर्गत चांपा विकासखण्ड का चयन किया गया है।

02.  प्रस्तुत अध्ययन हेतु चांपा विकासखण्ड के पांच गांव का चयन किया गया है।प्रस्तुत अध्ययन हेतु चांपा विकासखण्ड के पांच गांवों में रहने वाले पलायन करने वाले 20-20 श्रमिक परिवारों में से कुल 100 परिवारों का चयन किया गया है।

 

03.  प्रस्तुत अध्ययन हेतु चांपा विकासखण्ड के पलायन करने वाले श्रमिक परिवारों की आथर््िाक एवं सामाजिक स्थिति,परिवारों की षैक्षिक स्थिति, बच्चों की षैक्षिक समस्या संबंधी अध्ययन किया गया है। यह अध्ययन पलायन करने वाले श्रमिक परिवारों तक सीमित है।

 

04.  प्रस्तुत अध्ययन हेतु शोधकर्ता द्वारा निर्मित पलायन करने वाले श्रमिक परिवारों के लिए साक्षात्कार अनुसूची के निर्माण के लिए शोधकर्ता ने अपने निर्देषक से मार्गदर्षन प्राप्त किया है।

 

षोध प्रविधि:-

1.जनसंख्या: - जनसंख्या इकाईयों के समूचे समूह को जिसके लिए चर का मान निकालना अभीष्ट जनसंख्या कहते हैं। जिसमें जनसंख्या के लिए 1400 पलायन करने वाले श्रमिक परिवारों को शामिल किया गया है।

2. न्यादर्श:- प्रस्तुत शोध के उद्धेष्य की पूर्ति के लिए चांपा विकासखण्ड के पांच गांव का चयन किया गया है। जिसके अन्तर्गत 100 पलायन करने वाले श्रमिक परिवारों का चयन किया गया है। जिसके द्वारा शोध अध्ययन हेतु चांपा विकासखण्ड के पांच गांव के पलायन करने वाले श्रमिक परिवारों का चयन दैवनिदर्षन विधि से किया गया है। शोधकर्ता ने समस्या के समाधान हेतु पलायन करने वाले श्रमिक परिवारों का न्यादर्ष हेतु चयन किया है।

3. उपकरण:- प्रस्तुत लधुषोध प्रबंध में शोधकर्ता द्वारा स्वयं निर्मित उपकरण साक्षात्कार- अनुसूची का प्रयोग किया गया है।

4. सांख्यिकीय विष्लेषण:- अनुसंधान प्रक्रिया में चयनित प्रतिदर्षो के द्वारा प्रदत्तों का संकलन किया गया और सांख्यिकीय विष्लेषण किया गया। प्रस्तुत षोध अध्ययन में प्रतिषत विधि का प्रयोग समीक्षात्मक अध्ययन के लिए किया गया। पलायन करने वाले श्रमिक परिवारों के बच्चों की षैक्षिक समस्या का पर एक अध्ययन करने के लिए स्वनिर्मित साक्षात्कार अनुसूची का निर्माण किया गया है, जिसमें अधिकतर (हां/नहीं) वस्तुनिष्ठ प्रष्न हैं। इसके लिए संकलित प्रदत्तों को सारणीकृत किया गया और प्रदत्तों द्वारा प्राप्त आंकड़ों का योग कर प्रतिषत निकालागया है।

निष्कर्ष:- शोध अध्ययन के आधार पर षोधकर्ता को निम्नलिखित परिणाम प्राप्त हुए -

1.प्रथम परिकल्पना के अनुसार पलायन करने वाले श्रमिक परिवारों की आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति निम्न हो सकती है पर अध्ययन से प्राप्त निष्कर्ष परिकल्पना की पुष्टि करता है क्योंकि अध्ययनगत समूह के शतप्रतिषत खेतीहर मजदूर गरीबी रेखा के नीचे आते है, अधिकांष उत्तरदाता कच्चे मकान में रहते हैं तथा अधिकांष कृषि मजदूरों के पास कृषि भूमि तो है तो उससे उन्हें वर्ष के 4-6 माह ही रोजगार मिल पाता है। परिणामतः उन्हें अपने जीवकोपार्जन के लिए गैर कृषि मजदूरी करना पड़ता है। कृषि तथा गैर कृषि मजदूरी से प्राप्त आय को 55 प्रतिषत उत्तरदाता परिवार की आवष्यकता की दृष्टि से अपर्याप्त मानते हैं। इसी प्रकार खेतिहर श्रमिकों की सामाजिक स्थिति अच्छी नहीं है। अध्ययन से प्राप्त तथ्य यह स्पष्ट करता है कि 40 प्रतिषत उत्तरदाताओं के गांव में अधिकांष लोग निरक्षर हैं, 45 प्रतिषत उत्तरदतायह मानते हैं,कि गांव का वातावरण अच्छा नहीं रहता हैं,जबकि अधिकांष उत्तरदाताओं के अनुसार बच्चें एवं गांव के लोग नषापान करते हैं। इसी प्रकार गाँव में उपलब्ध मूलभूत सुविधाओं के विशय में षत् प्रतिषत उत्तरदाताओं षुद्ध पेय जल,बिजली और सड़क का उचित प्रबंध होना बतलाया है,जबकि 75 प्रतिषत उत्तरदाताओं ने नाली की भी व्यवस्था होने की जानकारी दिया है।

 

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि पलायन करने वाले श्रमिक परिवारों की सामाजिक - आर्थिक स्थति संतोषजनक नहीं कहीं जा सकती है।। इस प्रकार पलायन करने वाले श्रमिक परिवारों की की सामाजिक - आर्थिक स्थिति का प्रभाव बच्चों की षिक्षा पर पड़ता है। अतः परिकल्पना की पुष्टि होती है।

 

2. द्वितीय परिकल्पना के अनुसार पलायन करने वाले श्रमिक परिवारों की षैक्षिक स्थिति निम्न हो सकती है अध्ययन से प्राप्त निष्कर्ष परिकल्पना की पुष्टि करता है क्योंकि अध्ययनगत् पलायन करने वाले श्रमिक परिवारों षिक्षा के प्रति जागरूक है। अतः परिकल्पना की पुष्टि करता हैं।  उत्तरदाताओ की शैक्षणिक स्थिति संबंधी उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट होता है कि 49 प्रतिषत उत्तरदाता ही षिक्षित है 52 प्रतिषत 5वीं तक ही षिक्षा प्राप्त किए हुए है,46 प्रतिषत ने 8वीं तक षिक्षा प्राप्त किया है अधिकांष उत्तरदाताओं ने निरक्षर होने के कारण घर की आर्थिक स्थिति को माना है, 47 प्रतिषत ने पिता के द्वारा नही पढ़ाया जाना, 30 प्रतिषत के अनुसार खुद नही पढ पाना प्रमुख कारण है। अधिकांष उत्तरदाताओ की पत्नीयां निरक्षर है केवल 42 प्रतिषत माताएं ऐसी है जिन्होने प्राथमिक स्तर तक षिक्षा प्राप्त किया है

 

इस विषय में शोधार्थी का मानना है कि कुछ लोगो की पत्नियां 3-4थीं तक पढी थी तो भी वे इसे प्राईमरी मानकर चलते है। 55 प्रतिषत उत्तरदाताओं के पिता जी पढे लिखे थे वे भी 1-2 कक्षा तक। जहां आसपास के लोग भी निरक्षर है वहीं 45 प्रतिषत उत्तरदाताओं की रूचि षिक्षा के प्रति नही है। 49 प्रतिषत अभिभावक ने यह भी बतलाया है कि उनके परिवार के लोगो की रूचि षिक्षा के प्रति नही है निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि पलायन करने वाले श्रमिक परिवारों की षैक्षिक स्थति संतोषजनक नहीं कही जा सकती है।, अतः परिकल्पना की आंषिक पुष्टि होती है।

 

3.तृतीय परिकल्पना के अनुसार पलायन करने वाले श्रमिक परिवारों के षैक्षिक समस्या अध्ययन से प्राप्त निष्कर्ष परिकल्पना की पुष्टि करता है,क्योंकि बच्चो की शैक्षणिक स्थिति संबधी विवरण से यह ज्ञात होता है कि 79 प्रतिषत उत्तरदाताओं के बच्चे पढाई कर रहे है पर सभी बच्चे नही। अधिकांष 74 प्रतिषत उत्तरदाताओ के बच्चे प्राथमिक स्तर पर, 65 प्रतिषत के बच्चे प्राथमिक माध्यमिक दोनो में है,35 प्रतिषत उत्तरदाताओं के बच्चे हाईस्कूल में भी पढ़ रहे है। इस विषय में यह बताया जाना आवष्यक है कि कुल 100 उत्तरदाताओं में से एक से अधिक उत्तरदाताओं के बच्चे प्राथमिक, माध्यमिक, हाईस्कूल में पढ रहे हे इसी का समग्र विष्लेषण करने का प्रयास किया गया है। 19 प्रतिषत उत्तरदाता अपने बच्चों को निजी स्कूल में भी पढा रहे है। इसमे भी सभी 19 प्रतिषत उत्तरदाताओ के लडके, 9 प्रतिषत की लडकियाॅ तथा 9 प्रतिषत उत्तरदाताओं के लडके तथा लडकियाॅ दोनो ही निजी विद्यालय में अध्ययनरत है।

 

विष्लेषण के आधार पर यह कहा जा सकता है,कि गरीबी रेखा में जीवन यापन करने के बाद भी लगभग 20 प्रतिषत लोग अपने बच्चे को निजी विद्यालय मे पढाते है इसमें भी वे लडके को प्राथमिकता देते है। ज्यादातर लोग बच्चों को आवष्यक डेª, पुस्तक, जूता, बेल्ट, टिफिन की जरूरते पूरा करते है, वे कुछ 25 प्रतिषत  उत्तरदाता बच्चो को आटो या रिक्षा से स्कूल भेजते है। यह तथ्य परिवर्तन के रूप में देखा जा सकता है। बच्चों की प्रगति रिपोर्ट और पढाई के लिए प्रोत्साहन के विषय में वे उदासीन पाये गये है। जिसका कारण उनके सामाजिक परिवेष को दिया जा सकता है। निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि श्रम पलायन करने वाले श्रमिक परिवारों में बच्चों की षैक्षिक स्थति संतोषजनक नहीं कही जा सकती है।, इस प्रकार पलायन करने वाले श्रमिक परिवारों के बच्चों में षिक्षा की समस्या है। अतः परिकल्पना की पुष्टि होती है।

 

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Received on 11.10.2020            Modified on 19.11.2020

Accepted on 24.12.2020            © A&V Publications All right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2020; 8(4):235-241.